हर कोई बन रहा रावण है



संयम, सादगी, सबर पे आयी आफत है,
देखो, हर कोई बन रहा रावण है;

में ही में हु, न मुज जैसा कोई दूजा है,
ये बात ले आई क़यामत है;

हवस, लालच, अहंकार का आतंक है,
कोन बनेगा सर्वोपरि, इसका ही संग्राम है;

हर सीता पे इनकी अभिलाषा है;
फिर भी नारीवाद का देते जूठा दिलासा है;

कृपा, रहमत, धर्मदान; न इनको भाता है;
परोपकार से न कोई इनका नाता है;

अब आ जाये राम, यही आखरी आशा है,
क्योकि, हर कोई बन रहा रावण है;

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