ज़िंदगी



ग़ालिब की कविता सी हो रही हैं ज़िंदगी,
देखने में अच्छी लगती हैं, समजने में नहीं;

हजारों ठोकर खाकर भी संभल रहे हैं हम,
ये दिखाने मे अच्छा लगता हैं, असलियत में नहीं;

कश लगाता हु बचपन की यादों का कई दफ़ा,
हम उस बचपने में ही अच्छे थे, असलियत में नहीं;

धीरे-धीरे से हो रही हो तुम मेरी;
ये बातें सिर्फ बातो में ही अच्छी हैं, असलियत में नहीं;

इम्तिहान है हजारो, उत्तीर्ण होता नहीं नजर रहा हु कहीं,
प्रोत्साहन और उद्देश्य की बातें सिर्फ किताबों में अच्छी हैं, असलियत में नहीं;

आखिरी में सब अच्छा हो जाना,
ये सिर्फ फ़िल्म में होता हैं, असलियत में नहीं;

दुनियादारी के पीछे दौड़ रही हैं ये ज़िंदगी,
दुनियादारी सिर्फ पैसे के साथ अच्छी है, असलियत में नहीं;

रिश्तेदार कहते है कि आपका बच्चा बहुत आगे बढ़ेगा,
वो सिर्फ ये बातो में ही अच्छे हैं, असलियत में नहीं;

ज़िंदगी की नज़्मे लिखता हु, स्याही से कोरे कागज पर,
ज़िंदगी सिर्फ वो कोरे कागज पर ही अच्छी हैं, असलियत में नहीं;

फिर भी माँ का राजा-बेटा, लड रहा हैं अपने आप से; क्योंकि
ये शिकायत सिर्फ कविता में अच्छी हैं, असलियत में नहीं;


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